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फतवा जारी होने पर भी नहीं डरी नाजिमा बीबी,मणिपुर में चुनाव लडऩे वाली पहली मुस्लिम महिला

Patrika news network Posted: 2017-03-15 17:35:39 IST Updated: 2017-03-16 10:37:35 IST
फतवा जारी होने पर भी नहीं डरी नाजिमा बीबी,मणिपुर में चुनाव लडऩे वाली पहली मुस्लिम महिला
  • मणिपुर विधानसभा चुनाव के जब नतीजे आए तब सबसे ज्यादा चर्चा इरोम शर्मिला को लेकर हुई क्योंकि वह चुनाव हार गई।

मणिपुर विधानसभा चुनाव के जब नतीजे आए तब सबसे ज्यादा चर्चा इरोम शर्मिला को लेकर हुई क्योंकि वह चुनाव हार गई। लेकिन हम आपको एक और महिला के बारे में बताते हैं जो चुनाव के वक्त काफी सुर्खियों में रही थी। इनका नाम है नाजिमा बीबी।


नाजिमा बीबी पहली मुस्लिम महिला है जिन्होंने विधानसभा चुनाव में अपनी किस्मत आजमाई। इरोम की तरह नाजिमी भी चुनाव हार गई लेकिन नाजिमा ने जो हिम्मत दिखाई वो काबिले तारीफ है। नाजिमा बीबी ने इरोम शर्मिला की पार्टी पीपुल्स रिसर्जेंस एंड जस्टिस अलायंस(प्रजा) के टिकट पर वाबगई विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा। आपको बता दें कि इरोम शर्मिला ने थौबल सीट से इबोबी सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ा था। इरोम को सिर्फ 90 वोट मिल पाए। इरोम की पार्टी ने तीन उम्मीदवार खड़े किए। इनमें से नाजिमा भी एक थी।


नाजिमा के चुनाव लडऩे पर तूफान खड़ा हो गया। नाजिमा बीबी को धमकाया गया। उनके क्षेत्र के मौलवियों ने फतवा जारी किया और कहा कि चुनाव लड़ा तो मरने पर कब्र भी नसीब नहीं होगी लेकिन पांच बच्चों की मां नाजिमा बीबी डरी नहीं। नजीमा बीबी ने कहा, मुझे अपनी जिंदगी की परवाह नहीं है। जब तक मैं जिंदा हूं तब तक घरेलू हिंसा और मुस्लिम महिलाओं के सामाजिक उत्थान के लिए लड़ती रहूंगा। बचपन से ही मेरी जिंदगी संघर्ष भरी रही है। मैं किसी भी धमकी से नहीं डरती।


44 वर्षीय नाजिमा बीबी ने समर्थकों के साथ साइकिल से प्रचार किया। इसका मजाक बनाया गया। 10 वीं तक पढ़ी नाजिमा ने कहा,मैं वह काम कर रही हूं जो दूसरे लोग शायद नहीं करते,इसलिए वह मेरा मजाक बनाते हैं। मुस्लिम महिलाओं को इसलिए साइकिल नहीं चलाने दी जाती,ताकि उनकी गति धीमी पड़ जाए। मैं साइकिल चलाकर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच सकती हूं। उनसे मिल सकती हूं। बहुत कुछ कर सकती हूं और मैं ये करती रहूंगी।


बागी स्वभाव की नाजिमा बीबी बचपन से ही महिलाओं की स्वतंत्रता की पैरोकार रही है। नाजिमा बीबी जब स्कूल गई तब क्लास में वह एक मात्र छात्रा थी। उनके परिवार में कोई भी 10 वीं पास नहीं है। दसवीं कक्षा पास करते ही नाजिमा का निकाह तय कर दिया गया लेकिन वह घर से भाग गई। बाद में उन्होंने ऐसे शख्स से निकाह किया जिनसे वह सिर्फ दो बार मिली थी। उनका विवाह 6 माह से ज्यादा नहीं चला। तलाक के बाद अपने साथ साथ समाज की अन्य महिलाओं के लिए नाजिमा ने आर्थिक संसाधन जुटाने शुरू किए।


ऐसे ही एक प्रयास के तहत उन्होंने महिलाओं को चावल बैंक चलाने की प्रेरणा दी। घर पर चावल पकाते वक्त महिलाएं एक मुट्ठी चावल निकालकर अलग रख देती थीं। यह चावल नाजिमा बीबी के घर पर एकत्रित किया जाता था। दो महीने बाद महिलाएं अपना चावल नाजिमा के घर से लेकर उसे बेचती थी। इससे मिलने वाले पैसे से वे अपनी जरूरत की चीज खरीदती थी। नाजिमा बीबी की बनाई स्वयंसेवी संस्था मौलवियों को रास नहीं आई। उन्होंने मस्जिद पर लगे लाउड स्पीकरों से ऐलान किया कि नाजिमा महिलाओं को बर्बाद कर देगी।


जब नाजिमा की गतिविधियां नहीं रूकी तो उनके सामाजिक बहिष्कार की घोषणा कर दी गई। मोहल्ले की दुकानों से उन्हें सामान मिलना बंद हो गया।गांव के तालाबा से पानी मिलना बंद हो गया। उनके शौहर को दो बार पीटा गया। कुछ समय बाद मणिपुर जमीयतुल उलेमा के हस्तेक्षप के बाद यह सामाजिक बहिष्कार बंद हुआ। नाजिमा बीबी ने इरोम शर्मिला का साथ देना तब शुरू किया जब उनके 16 साल से चल रहे अनशन तोडऩे के बाद परिवार ने भी उनका साथ देना बंद करर दिया था। नाजिमा बीबी कहती हैं कि तब मैंने शर्मिला के कंधे से कंधा मिलाकर चलने का फैसला किया।