असम की इस महिला ने जीता ग्रीन ऑस्कर, किया था ये बड़ा काम

Daily news network Posted: 2017-05-20 16:36:39 IST Updated: 2017-05-20 16:36:39 IST
असम की इस महिला ने जीता ग्रीन ऑस्कर, किया था ये बड़ा काम
  • भारत में जानवरों और पक्षियों के संरक्षण के क्षेत्र में काम के लिए दो भारतीय कार्यकर्ताओं को वार्षिक व्हिटली अवार्डस से सम्मानित किया गया

नई दिल्ली।

भारत में जानवरों और पक्षियों के संरक्षण के क्षेत्र में काम के लिए दो भारतीय कार्यकर्ताओं को वार्षिक व्हिटली अवार्डस से सम्मानित किया गया। इन पुरस्कारों को 'ग्रीन ऑस्कर' भी कहा जाता है। असम की पूर्णिमा बर्मन को हरगिला और उसके नमी वाले निवासस्थान को बचाने के लिए महिलाओं का नेटवर्क बनाने और संजय गुब्बी को कर्नाटक के बाघ कॉरीडोर के संरक्षण की दिशा में काम करने के लिए यह पुरस्कार दिया गया। ये दोनों भारतीय 166 देशों से चुने गए 6 वैश्विक विजेताओं में शामिल हैं। प्रत्येक विजेता को पुरस्कार राशि के तौर पर एक साल में 35,000 पाउंड (45,374 अमरीकी डॉलर) की रकम मिलेगी।



बता दें कि अंतराष्ट्रीय स्तर पर बेहद प्रतिष्ठित यह पुरस्कार दुनिया के विकासशील देशों में प्रकृति संरक्षण के क्षेत्र में जमीनी स्तर पर असाधारण काम करने वाले व्यक्ति को दी जाती है, खासकर ऐसे व्यक्ति को, जिन्हें संरक्षण कार्य में मानवीय, पर्यावरणीय या राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। 



अवार्ड के लिए नामांकित एक अन्य भारतीय संरक्षणवादी गुब्बी को कर्नाटक के टाइगर कॉरिडोर में जंगल की कटाई रोकने के लिए जाना जाता है।  वहीं असम के कामरूप जिले की रहने वाली 37 वर्षीय पूर्णिमा पिछले कई साल से गरुड़ पक्षी और उसके प्राकृतिक वास को बचाने में जुटी हुई हैं। गौरतलब है कि स्थानीय भाषा में गरुड़ को हार्गिला कहा जाता है।



गरुड़ के संरक्षण को लेकर पूर्णिमा की लोकप्रियता को इसी से समझा जा सकता है कि कामरूप जिले में गरुड़ के सबसे बड़े प्राकृतिक वास दादरा गांव में उन्हें लोग 'हार्गिला बैद्यू' कहकर पुकारते हैं, जिसका स्थानीय अर्थ हुआ 'गरुड़ की बहन'। दादरा गांव में अब 1,000 के करीब गरुड़ वास करते हैं, जिसका पूरा श्रेय पूर्णिमा की मेहनत और लगन को जाता है। पूर्णिमा ने गरुड़ों के संरक्षण के लिए खुद को समर्पित कर दिया और इसके लिए उन्होंने शिक्षक की नौकरी तक छोड़ दी।




पूर्णिमा ने कहा, यह सब 2009 में शुरू हुआ, जब जैव विविधता के संरक्षण के लिए काम करने वाली संस्था आरण्यक ने गरुड़ पक्षी के संरक्षण के लिए पहल की। इसके लिए आरण्यक ने स्थानीय निवासियों में जागरूकता फैलाने के लिए मुझे अपने साथ जोड़ा।