असम की इस बॉक्सर को लोग कर रहे हैं सलाम, जानिए क्यों

Daily news network Posted: 2018-02-12 16:14:43 IST Updated: 2018-02-12 16:14:43 IST
असम की इस बॉक्सर को लोग कर रहे हैं सलाम, जानिए क्यों
  • जिंदगी मे कभी हार मानने वाली और मुश्किलों से लड़कर अपनी मंजील पाने वाली एक ऐसी ही खिलाडी से आज हम आपको मिलवाने जा रहे हैं

गुवाहाटी

जिंदगी मे कभी हार मानने वाली और मुश्किलों से लड़कर अपनी मंजील पाने वाली एक ऐसी ही खिलाडी से आज हम आपको मिलवाने जा रहे हैं जिन्होंने मुश्किलों से लड़कर आज देश का नाम रोशन किया है।

                                                                                                                 

असम के शोणितपुर जिले में छोटे से गांव में जन्मी जमुना बोडो आज भारतीय महिला मुक्केबाजी में जाना पहचाना नाम है। जमुना के मुक्के का दम तो दुनिया कई बार देख चुकी है। लेकिन उनके जीवन के बारे में काम लोग ही जानते हैं एक गरीब परिवार से अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाज बनने का सफर जमुना के लिए आसान नहीं था। मां की हिम्मत और बुलंद इरादों ने जमुना को बेहतरीन मुक्केबाज बना दिया है।


जमुना सिर्फ दस साल की थी, जब उनके पिता इस दुनिया से चल बसे। बच्चे सदमें थे, मां बेहाल थी। अब बच्चों की परवरिश की सारी जिम्मेदारी मां पर आ गई थी। जमुना ने मीडिया को बताया है कि उनकी मां बहुत हिम्मत वाली औरत हैं। जिनकी वजह से मैं मुक्केबाज बन सकी। पिता के देहांत के बाद घर चलाने के लिए जमुना की मां ने सब्जी बेचने का फैसला किया। मां बेलसिरी गांव के रेलवे स्टेशन के बाहर सब्जी बेचने लगी।


इस तरह से जीवन को पटरी पर लाने की कोशिश शुरू हो गई। जमुना स्कूल जाने लगी और मां ने बड़ी बहन की शादी कर दी। इसके अलावा उनका बड़ा भाई है जो पूजा पाठ का काम करता है। अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी बनने के बावजूद उन्हें अब भी पैसों की बड़ी परेशानी होती है। देश में ट्रैवल करने के लिए घर से पैसे मांगने पड़ते हैं।


जमुना के गांव में वुशु गेम खेला जाता है। स्कूल से लौटते वक्त अक्सर वह लड़कों को इस खेल को खेलते देखती थीं। वुशु जूडो-कारटे और टाइक्वांवडो की तरह एक मार्शल आर्ट है। यह खेल जमुना दिलचस्प लगने लगा उन्हें यह खेल इतना रोमांचकारी लगता था कि वह खुद को रोक नहीं पाईं और लड़कों के साथ वुशु खेलना शुरू कर दिया। जल्द ही जमुना को इस बात का एहसास हुआ कि वुशु गेम में उनके लिए कोई खास संभावना नहीं है। उन्होंने बॉक्सर मैरीकॉम के बारे में काफी कुछ सुन रखा था। वो बॉक्सिंग सीखना चहाती थी लेकिन गांव में इसकी ट्रैनिंग की कोई सुविधा नहीं थी।


साल 2013  में सर्बिया में इंटरनेशनल सब जूनियर गर्ल्स बॉक्सिंग टूर्नामेंट में उन्होंने गोल्ड मेडल जीतकर देश को एक बड़ा तोहफा दिया। इसके बाद साल 2014 में रूस में बॉक्सिंग टूर्नामेंट में गोल्ड मेडल जीकर वह चैंपियन बनीं। 2015 में ताइपे में यूथ वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप में उन्होंने ब्रॉन्ज मेडल जीता ।


जमुना का अगला लक्ष्य 2020 में टोक्यों में होने वाले ओलंपिक खेलों में हिस्सा लेने पर हैं। इसके लिए वो दिन रात प्रैक्टिस में जुटी हैं। जमुना कहती हैं कि अब मेरा लक्ष्य ओलंपिक पदक जीतने का है। जिसके लिए मैं अभी से तैयारियों में जुटी हूं।