सुबोध बिस्वास के केस में असम सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने लगाई फटकार

Daily news network Posted: 2017-11-09 14:27:16 IST Updated: 2017-11-09 14:27:16 IST
सुबोध बिस्वास के केस में असम सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने लगाई फटकार
  • सुबोध बिस्वास के केस में असम सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी फटकार लगाई है। असम सरकार के ढीले ढाले रवैये पर नाराजगी प्रकट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया है।

नई दिल्ली/गुवाहाटी।

सुबोध बिस्वास के केस में असम सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी फटकार लगाई है। असम सरकार के ढीले ढाले रवैये पर नाराजगी प्रकट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया है। सिलापाथर कस्बे में ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन के दफ्तर पर हमले के मामले में मुख्य आरोपी सुबोध बिस्वास की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायाधीश नागेश्वर राव और न्यायाधीश ए.एस.बोबडे ने असम सरकार को नोटिस जारी कर पूछा कि 60 दिन के भीतर आरोप पत्र क्यों दाखिल नहीं किया गया? आपको बता दें कि 60 दिन में आरोपी के खिलाफ अगर आरोप पत्र दाखिल नहीं किया जाता है तो वह जमानत पाने का हकदार हो जाता है।

इस तरह की अटकलें है कि आरोप पत्र दाखिल नहीं होने के कारण सुबोध बिस्वास को जमानत मिल सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने याचिककर्ता को सुबोध बिस्वास के भाषण की सीडी सौंपने को कहा। सुबोध बिस्वास ने सिलापाथर में कथित रूप से भड़काऊ भाषण दिया था। मामले के संबध में असम पुलिस की ओर से अभी तक इतने बड़े और महत्वपूर्ण सबूत को नहीं सौंपे जाने से सरकार का ढीला ढाला रवैया उजागर हुआ है। सुबोध बिस्वास नागपुर स्थित हिंदू बंगाली संगठन एनबीबीयूएसएस का अध्यक्ष है। वह 6 मार्च से असम से फरार था। 22 मार्च को उसे पश्चिम बंगाल से गिरफ्तार किया गया था। असम व पश्चिम बंगाल पुलिस की संयुक्त टीम ने उसे 24 परगमा जिले से गिरफ्तार किया था।

सुबोध के साथ उसके सहयोगी सुभाष बिस्वास को भी गिरफ्तार किया गया था। सुबोध बिस्वास पर आरोप है कि धेमाजी जिले के सिलापाथर कस्बे में 6 मार्च को ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन(आसू) के दफ्तर पर हमला करने वाली भीड़ का उसने नेतृत्व किया था। बिस्वास और एनबीबीयूएसएस के दिल्ली व नागपुर स्थित नेताओं ने आसू के दफ्तर पर हमले से एक दिन पहले सिलापाथर में एक जनसभा के दौरान कथित रूप से भड़काऊ भाषण दिया था। बिस्वास व अन्य नेताओं ने रैली के दौरान नागरिकता(संशोधन) बिल 2016 के मुताबिक हिंदू बांग्लादेशियों को भारतीय नागरिकता देने की मांग की थी। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने जुलाई 2016 में यह बिल पेश किया था।