स्‍थानीय हस्‍तशिल्‍प है यहां की सबसे बड़ी विशेषता, खूबसूरत है यहां का नजारा

Daily news network Posted: 2017-10-10 18:20:03 IST Updated: 2017-10-10 19:16:45 IST
स्‍थानीय हस्‍तशिल्‍प है यहां की सबसे बड़ी विशेषता, खूबसूरत है यहां का नजारा
  • कुल्लू घाटी को पहले कुलंथपीठ कहा जाता था। कुलंथपीठ का शाब्दिक अर्थ है रहने योग्‍य दुनिया का अंत। कुल्‍लू घाटी भारत में देवताओं की घाटी रही है।

कुल्लू घाटी को पहले कुलंथपीठ कहा जाता था। कुलंथपीठ का शाब्दिक अर्थ है रहने योग्‍य दुनिया का अंत। कुल्‍लू घाटी भारत में देवताओं की घाटी रही है। यहां के मंदिर, सेब के बागान और दशहरा हजारों पर्यटकों को कुल्‍लू की ओर आकर्षित करते हैं। यहां के स्‍थानीय हस्‍तशिल्‍प कुल्‍लू की सबसे बड़ी विशेषता है।

 

ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क

कुल्लू आकर यात्रियों को ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क में वन्य जीवन की एक विस्तृत विविधता को देखने का मौका मिलता है जहां पशुओं की 180 से अधिक प्रजातियां है।

पंडोह बांध

76 मीटर की ऊंचाई पर स्थित पंडोह बांध, ब्यास नदी पर निर्मित है। यह जल विद्युत शक्ति उत्पादक बांध कुल्लू और मनाली की बिजली की आवश्यक्ताओं को पूरा करता है।

ट्रैकिंग

कुल्लू ट्रैकिंग, पर्वतारोहण, लंबी पैदल यात्रा, पैराग्लाइडिंग, और रिवर राफ्टिंग जैसी विभिन्न साहसिक खेलों के लिए भी जाना जाता है। लोकप्रिय ट्रैकिंग ट्रेल्स लद्दाख घाटी, जांस्कर घाटी, लाहौल और स्पीति हैं। 

साहसिक खेल पैराग्लाइडिंग के लिए कुल्लू भारत में प्रसिद्ध है। यहां आदर्श लांच साइटें सोलंग, महादेव, और बीर हैं। आगंतुकों को भी इस क्षेत्र में हनुमान टिब्बा, ब्यास कुंड, मलाना, देव टिब्बा और चन्द्रताल में पर्वतारोहण कर सकते हैं। यात्री ब्यास नदी में मछली पकडऩे की कोशिश भी कर सकते हैं।

पूरे क्षेत्र में व्यवस्थित ढंग से दुकानें लगती हैं और बड़ी चहल-पहल होती है। दुकानों में हथकरघे पर बनी वस्तुएं, शॉलें, पट्टू, पुराने ढंग के बर्तन आदि कई चीजें ली जा सकती हैं। मैदान के साथ ही हिमाचल प्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग द्वारा नृत्य, नाटक और संगीत के कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। इन कार्यक्रमों में राज्य तथा विदेशों की संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। 

देशी और विदेशी पर्यटक यहां खूब आनंद लेते हैं। स्थानीय लोग पारंपरिक वेशभूषा में देखे जा सकते हैं। वास्तव में इस उत्सव के दौरान कुल्लू के सामाजिक रीति-रिवाज, लोगों के रहन-सहन, संगीत और नृत्य के प्रति उनके प्रेम के साथ ही क्षेत्रीय इतिहास और धार्मिक आस्थाओं को सजीव रूप में देखा जा सकता है।

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू दशहरा संपन्न होने से एक दिन पूर्व सभी देवी-देवता श्री रघुनाथ जी के पास जाते हैं। इस सभा को देवता दरबार कहा जाता है। उत्सव के अंतिम दिन रथ को व्यास नदी के किनारे पेड़ों के घने झुरमुट में ले जाया जाता है। फिर घास का एक छोटा सा ढेर लगाकर उसमें आग लगाई जाती है जो लंका दहन का प्रतीक है। 

शाम होते-होते उत्सव संपन्न हो जाता है। श्री रघुनाथ जी को सजी हुई पालकी में बैठाकर सुलतानपुर के मंदिर में पुन: ले जाकर स्थापित कर दिया जाता है। अन्य देवी-देवताओं को भी अपनी-अपनी सुविधानुसार मंदिरों में वापस ले जाकर पुन: स्थापित कर दिया जाता है।

कुलंतापीठ

समुद्रतल से लगभग 1200 मीटर की ऊंचाई पर बसे कुल्लू को प्राचीन काल में मनुष्य के रहने के अंतिम छोर पर बसा स्थान माना जाता था। लोकगीतों में कुल्लू को कुलंतापीठ अर्थात रहने योग्य अंतिम स्थान के नाम से संबोधित किया जाता है। वास्तव में कुल्लू का प्राचीन नाम कुलता है, जिसका उल्लेख विष्णु पुराण और रामायण में मिलता है। 

महाभारत में उत्तर भारत के राज्यों की सूची में भी इसका नाम है। सातवीं शताब्दी में आए चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने भी अपने यात्रा संस्मरण में क्यू-लू-तो नाम से इसका जिक्र किया है और इसे जालंधर से 117 मील उत्तर-पूर्व में स्थित बताया है। इस क्षेत्र के प्राचीनतम ऐतिहासिक दस्तावेजों में कुल्लू के राजा द्वारा जारी किया गया एक सिक्का भी है। 

इस पर लिखा है-रज्न कोतुलतरया वीरयस्सय अर्थात् कुलता या कुलतस का राजा। यद्यपि राजवंश की वंशावली में इस राजा का नाम नहीं मिलता। परंतु माना जाता है कि यह सिक्का पहली या दूसरी शताब्दी का है।

कुल्लु घाटी में अनेक जगह ऐसी हैं जहां मछली पकडऩे का आनंद उठाया जा सकता है। इन जगहों में पिरडी, रायसन, कसोल नगर और जिया प्रमुख हैं। इसके साथ ही ब्यास नदी में वॉटर राफ्टिंग का मज़ा लिया जा सकता है। इन सबके अलावा यहां ट्रैकिंग भी की जा सकती है।