लाउडस्पीकर से दी गई अजान को गैरइस्लामिक मानता है यह मुसलमान, बंद करा दिए 7 भोंपू

Daily news network Posted: 2017-04-21 15:55:28 IST Updated: 2017-04-21 15:55:28 IST
लाउडस्पीकर से दी गई अजान को गैरइस्लामिक मानता है यह मुसलमान, बंद करा दिए 7 भोंपू
  • मोहम्मद अली उर्फ बाबूभाई 66 साल के नमाजी मुसलमान हैं और लाउडस्पीकर से दी हुई अजान को गैर इस्लामिक मानते हैं

मुंबई।

सोनू निगम के सोशल मीडिया पर किए गए ट्विट के बाद पूरे देश भर के मुसलमान जहां एक ओर उनके खिलाफ नजर आ रहे हैं। यहां तक कि एक मौलवी ने तो उनके खिलाफ फतवा तक जारी कर दिया था, लेकिन एक मुसलमान ऐसा भी है, जिसने लाउडस्पीकर पर चलती अजान का खुलकर और लगातार विरोध किया है। मुम्बई के मोहम्मद अली उर्फ बाबूभाई 66 साल के नमाजी मुसलमान हैं और लाउडस्पीकर से दी हुई अजान को गैर इस्लामिक मानते हैं। अपनी बात को मनवाने के लिए ढलती उम्र में उन्होंने हाईकोर्ट में पिटीशन लगाई। पैसे कम थे इसलिए मामले में पैरवी खुद की।


टीवी चैनल एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक याचिकाकर्ता मोहम्मद अली उर्फ बाबूभाई ने कहा कि लाउडस्पीकर का इस्तेमाल धर्म का हिस्सा नहीं है, न ही यह बुनियादी है, क्योंकि धर्म 1400 साल पुराना है और लाउडस्पीकर अभी कुछ सौ साल पहले आया है। लाउडस्पीकर को हटाना धर्म को कोई खतरा नहीं है। धर्म अपने आप में मुकम्मल है, वो लंगड़ा नहीं है कि उसे लाउडस्पीकर की बैसाखी देकर ताकतवर बनाओ। बाबू भाई की कानूनी जीत अब एक मुहिम में तब्दील हो गई है। उन्होंने अपने दावे को मजबूत बनाने के लिए धर्मग्रंथ के साथ मौलवियों के 64 फतवे भी ढूंढ निकाले हैं, वे लगतार बताते हैं कि उनकी लड़ाई धर्म के खिलाफ नहीं बल्कि धर्म के नाम पर रोजमर्रा के आचरण में जोड़ी गई अतिरिक्त और गैरजरूरी बातों के खिलाफ है।


कुरान के हवाले से उन्होंने मुंबई में बेहराम पाड़ा और भारत नगर जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों की सात मस्जिदों पर से सारे लाउडस्पीकर उतरवा दिए हैं। धर्मस्थलों पर बजते लाउडस्पीकर को लेकर संतोष पाचलग, डॉ बेडेकर और मोहम्मद अली तीनों की याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए बाम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस ओक और जस्टिस सैय्यद अमजद ने अगस्त 2016 में फैसला सुनाते हुए कहा कि देश मे कहीं भी लाउडस्पीकर का इस्तेमाल रात दस से सुबह 6 के बीच करने वालों पर एक लाख रुपये तक का जुर्माना और पांच साल तक की जेल होगी। गौरतलब है कि बाबूभाई ने अपनी बात रखने के लिए सोशल मीडिया पर बोलने के बजाए संवैधानिक हक का इस्तेमाल किया। इस वजह से आया फैसला अब पूरे देश पर लागू हो चुका है।