एक फैसले से असम की 48 लाख मुस्लिम महिलाओं की जान में जान आई

Daily news network Posted: 2017-12-06 18:54:23 IST Updated: 2017-12-06 18:54:23 IST
एक फैसले से असम की 48 लाख मुस्लिम महिलाओं की जान में जान आई
  • सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से असम की करीब 47 लाख बांग्लाभाषी मुस्लिम विवाहित महिलाओं की जान में जान आई है।

आईजोल/नई दिल्ली।

सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से असम की करीब 47 लाख बांग्लाभाषी मुस्लिम विवाहित महिलाओं की जान में जान आई है। सुप्रीम कोर्ट ने गुवाहाटी हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया है नागरिकता के दावे के लिए  ग्राम पंचायत की ओर से जारी प्रमाण पत्रों को अवैध ठहराया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पंचायत सचिव या कार्यकारी मजिस्ट्रेट की ओर से जारी प्रमाण पत्र का इस्तेमाल नागरिकता के दावे के लिए किया जा सकता है। हालांकि इसके लिए जरूर है कि प्रमाण पत्र समुचित जांच के बाद ही जारी किए गए हों। जस्टिस रंन गोगोई और आरएफ नरीमन की खंडपीठ ने कहा कि ग्राम पंचायत सचिव की ओर से जारी प्रमाण पत्र में परिवार से जुड़ी जानकारियां होती हैं इसलिए इसे नागरिकता के सबूत के तौर पर माना जा सकता है।

इससे पहले 22 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने पंचायत के निवास प्रमाण पत्र को नागरिकता का दस्तावेज मानने से इनकार कर दिया था। उसने कहा था कि इस प्रमाण पत्र का तब तक कोई मायने नहीं है जब तक नागरिकता से संबंधित राष्ट्रीय रजिस्टर(एनआरसी) में नाम दर्ज कराने के लिए इसके साथ कोई और वैध रिकॉर्ड न दिया जा। एनआरसी में नाम दर्ज कराने के ए 3.29 करोड़ लोगों ने दावा किया है जिनमें से 48 लाख ने पंचायत सचिव का प्रमाण पत्र दिया है। आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस का अपडेशन चल रहा है। राज्य में बड़ी संख्या में घुसपैठ कर चुके विदेशियों खासतौर पर बांग्लादेशियों की पहचान कर उन्हें वापस भेजने की प्रक्रिया के लिए एनआरसी अपडेशन का काम चल रहा है। यह प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चल रही है।

सुप्रीम कोर्ट के वकील फुजैल अहमद अय्युबी बताते हैं कि पंचायत सेक्रेटरी सर्टिफिकेट खासतौर पर ऐसी महिलाओं के ए ही मान्य था जो शादी के बाद ऐसे इलाकों में चली जाती हैं जहां उनका नाम किसी अन्य आवासीय दस्तावेज में नहीं होता, इसलिए अपनी पहचान बताने के लिए वे माता पिता के गांव आकर आवासीय प्रमाण पत्र हासिल करती रही हैं। राज्य में विदेशियों की पहचान के लिए बनी पंचाट ने 2016 से पहले 80 हजार 194 लोगों को संदिग्ध माना था। इसके बाद इसमें अचानक तेजी आई। हर माह करीब एक हजार लोगों की इसमें बढ़ोतरी हो रही है। विदेशी पंचाट का गठन तब किया गया था जब 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने 1983 में गठित अवैध घुसपैठ निर्धारण पंचाट(आईएमडीटी) को असंधानिक माना था।