असम में नागरिकता कानून बना बीजेपी के गले की हड्डी

Daily news network Posted: 2017-05-17 11:44:59 IST Updated: 2017-05-17 11:44:59 IST
असम में नागरिकता कानून बना बीजेपी के गले की हड्डी
  • असम चुनावों के दौरान भारतीय जनता पार्टी द्वारा किया गया एक वादा अब उनकी ही गले की हड्डी बनता जा रहा है।

नई दिल्ली।

असम चुनावों के दौरान भारतीय जनता पार्टी द्वारा किया गया एक वादा अब उनकी ही गले की हड्डी बनता जा रहा है। दरअसल बीजेपी ने बांग्लादेशी हिंदुओं को नागरिकता देने का वादा किया था। असम सरकार की सहयोगी पार्टी- असम गण परिषद (एजीपी) इस वादे पर बीजेपी के साथ नहीं दिख रही है, वहीं राज्य के ताकतवर छात्र संगठन अखिल असम छात्र संघ (आसू) समेत कोई तीन दर्जन संगठन इसका विरोध कर रहे हैं। इन्हें डर है कि नागरिकता तानून में बदलाव से उन करीब एक करोड़ 70 लाख हिंदुओं के असम प्रवेश का रास्ता खुल जाएगा जो फिलहाल बांग्लादेश में रह रहे हैं।



एजीपी ने इसे असम समझौते के खिलाफ बताया है। असम समझौत में साफ किया गया था कि 24 मार्च 1971 के बाद बांग्लादेश से आए किसी भी व्यक्ति को असम से जाना होगा, चाहे वो हिंदू हो या मुसलमान। एजीपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल कुमार महंत इस मुद्दे पर राष्ट्रपति से मिले, साथ ही उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह से भी मुलाकात की। पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा है कि वो इस मुद्दे पर देश के अन्य राष्ट्रीय नेताओं से संपर्क में है ताकि बिल के खिलाफ आम सहमति बनाई जा सके।



राज्य में अवैध विदेशियों के खिलाफ साल 1979 से छह साल लंबे चले आंदोलन में महंत प्रमुख भूमिका निभाने वालों में से एक थे। राजीव गांधी की सरकार के समय केंद्र, राज्य सरकार और ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) के बीच साल 1985 में हुए असम समझौते पर महंत के हस्ताक्षर हैं। भले ही महंत की पार्टी एजीपी इस समय बीजेपी सरकार की सहयोगी है लेकिन वे हिंदू बांग्लादेशी मुद्दे को लेकर चुप्पी साधने को तैयार नहीं हैं, जबकि प्रदेश के वित्त मंत्री हिमंत विश्वशर्मा का कहना है कि हिंदू बांग्लादेशियों को बसाने से असम को फायदा होगा और इससे मुसलमानों को यहां बहुसंख्यक समुदाय बनने से रोका जा सकेगा।



कहा जा रहा है कि असम में हिंदू बांग्लादेशियों को नागरिकता देने के मुद्दे पर लगातार हो रहे विरोध के कारण पिछले साल संसद में पेश किए गए नागरिकता (संशोधन) विधेयक 2016 को लेकर केंद्र सरकार की तत्परता थोड़ी धीमी पड़ गई हैं। सरकार ने भाजपा सांसद सत्यपाल सिंह के नेतृत्व में संयुक्त संसदीय समिति बना दी है जो कानून में बदलाव को लेकर अलग-अलग संगठनों से बात कर रही है। पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने असमिया लोगों से जाति, माटी, भेटी यानी अर्थात जाति, जमीन और अस्तित्व की रक्षा करने का वादा किया था और उसे पार्टी की जीत की बड़ी वजह माना गया था, लेकिन हिंदू बांग्लादेशी शरणार्थियों को बसाने की बात पर, जो कि पार्टी के चुनाव घोषणा पत्र का हिस्सा है, असमिया समुदाय विरोध में खड़ा हो जाता है।