ये है असम का वो जवान जो दलाई लामा को तिब्बत से लेकर आया था तवांग

Daily news network Posted: 2017-05-16 15:20:48 IST Updated: 2017-05-16 15:20:48 IST
ये है असम का वो जवान जो दलाई लामा को तिब्बत से लेकर आया था तवांग
  • तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा आज भी भारतीय सेना के एक जवान के शुक्रगुजार है

गुवाहाटी।

तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा आज भी भारतीय सेना के एक जवान के शुक्रगुजार है। दरअसल इंडियन आर्मी के अब रिटायर्ड हो चुके नरेन दान वही जवान हैं, जिनकी वजह से दलाई लामा तिब्बत से सुरक्षित भाग सके थे। वर्ष 1959 में दास और उनके चार साथियों ने उनकी भागने में मदद की और फिर उन्हें सुरक्षित तवांग लेकर आए थे। हाल ही में एक कार्यक्रम में जब दलाई लामा ने जवान को सैल्यूट किया तो सभी हैरान रह गए। 


 

बता दें कि वर्ष 1959 में चीनी आर्मी ने ल्हासा में तिब्बत के लिए जारी संघर्ष को कुचल दिया। तब दलाई लामा वहां से भाग निकले थे और उसके बाद से ही वह भारत में निर्वासन की जिंदगी बिता रहे हैं। दलाई लामा हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में रहते हैं। धर्मशाला आज तिब्ब्ती की राजनीति का केंद्र बन गया है। करीब 58 वर्ष बाद जब तिब्बती धर्मगुरू दलाई लामा राइलफमैन दास से मिले तो खुद को उन्हें सैल्यूट करने से रोक नहीं पाए। दलाई लामा ने उन्हें गले लगया और बरसों पहले के उस पल को यादकर एन सी दास से का शुक्रिया अदा किया। वर्ष 1959 में एन सी दास अरूणाचल प्रदेश के सीमावर्ती इलाके में तैनात थे। उनकी तैनाती के समय ही उन्हें दलाई लामा को तिब्बत सीमा से सुरक्षित भारत लाने का आदेश मिला था। दास ने अपनी ड्यूटी पूरी की और दलाई लामा को मैकमोहन रेखा से सुरक्षित भारत लेकर आए



दलाई लामा को इंडियन आर्मी की जो टुकड़ी सुरक्षित भारत लेकर आई थी उसमें आधा दर्जन जवानों के साथ कंपनी कमांडर भी थे। दास उस समय सिर्फ 22 वर्ष के थे और दलाई लामा की उम्र 23 वर्ष थी। दास से मिलने के बाद दलाई लामा ने कहा, वृद्ध हो चुके एक सैनिक से मिलकर, जो मुझे सीमा पार से सुरक्षित लेकर आया, उससे मिलकर मुझे भी अहसास हो रहा है कि मैं भी अब बूढ़ा हो चुका हूं। दास ने भी उस मौके को याद किया जब दलाई लामा ने अपनी पहली रात इंटरनेशनल बॉर्डर लुमला में गुजारी, जहां पर उनका भारत सरकार के अधिकारियों ने उनका स्वागत किया था। दास ने बताया, अगली सुबह असम राइफल्स की एक और टीम ने दलाई लामा को सुरक्षा दी और उनके बॉडीगार्ड्स उन्हें तवांग लेकर चले गए थे। दास बताते हैं कि उस समय सीमा के उस पार कोई भी चीनी नहीं था। उस समय यह तिब्बत था और चीन की सीमा उत्तर में भारत के साथ नहीं थी बल्कि तिब्बत से सटी थी।