पिछले 5 सालों में एेसा क्या हुआ कि वामपंथियों के हाथ से फिसलती जा रही है सत्ता

Daily news network Posted: 2018-02-14 17:40:39 IST Updated: 2018-02-14 17:40:39 IST
पिछले 5 सालों में एेसा क्या हुआ कि वामपंथियों के हाथ से फिसलती जा रही है सत्ता
  • 18 फरवरी को होने वाल त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी कम्युनिस्टों के इस मजबूत किले में सेंध लगाने का दावा कर रही है।

अगरतला।

18 फरवरी को होने वाल त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी कम्युनिस्टों के इस मजबूत किले में सेंध लगाने का दावा कर रही है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने तो दो-तिहाई बहुमत से जीत हासिल करने का दावा किया हैं। पिछले 2 दशकों में यह पहली बार एेसा हुआ कि भारतीय जनता पार्टी अपनी सहयोगी पार्टी आर्इपीएफटी के साथ मिलकर राज्य में सभी 60 सीटों पर चुनाव लड़ रही है।


अब ये सवाल उड़ता है कि पिछले 5 सालों में ऐसा क्या हो गया कि भाजपा राज्य में दो-तिहाई मतों से जीत का दावा कर रही है। जानकारी के मुताबिक उत्तर पूर्व के सभी राज्यों में विकास को देखा जाए तो त्रिपुरा में ग्रामीण विकास, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण आदि में अच्छा काम हुआ है।

 

 

गौरतबल है कि अगर 1988 से 1993 तक कांग्रेस नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार को छोड़ दें तो त्रिपुरा में 1978 से लेकर अब तक वाम मोर्चा की सरकार है। वर्तमान मुख्यमंत्री माणिक सरकार 1998 से सत्ता में है। देश का छोटा सा राज्य त्रिपुरा जो हमेशा से लाइमलाइट से दूर रहा हैं लेकिन इस बार बात कुछ आैर है।


त्रिपुरा जाेर शोर से चर्चा में है क्योंकि इस बार बात कुछ आैर है सभी की निगाहें वहां होने वाले विधानसभा चुनाव पर टिकी हैं। वाममोर्चा के गढ़ के रूप में बचे आखिरी किलों में एक इस राज्य में पहली बार वाम और दक्षिण की लड़ाई देखी जा रही है। राज्य में भाजपा आैर माकपा की लड़ार्इ महज वोटों की नहीं बल्कि दो पूरी तरह उल्टी विचारधाराओं की है।

वैसे राजनीति के माहिर इसे अमित शाह का चुनावी जुमला मानते हुए कहते हैं कि देश भर में माणिक सरकार के कामों की तारीफ होती है, वे सबसे कम सम्पत्ति वाले मुख्यमंत्री हैं। साक्षरता दर के मामले में त्रिपुरा देश भर में अव्वल है। मुख्यमंत्री माणिक सरकार के बारे में कहा जाता है कि वह अशांत त्रिपुरा में शांति और सुरक्षा बहाल करने में कामयाब रहे हैं। ऐसे में अमित शाह त्रिपुरा के पिछडऩे की बात कह रहे हैं। भाजपा को कभी हिन्दी प्रदेश की पार्टी कहा जाता था लेकिन त्रिपुरा में अगर उसे कामयाबी मिली तो पूर्वोत्तर भारत में उसकी पकड़ और मजबूत होगी।