त्रिपुराः क्या भाजपा फहराएगी विजय पताका या लेफ्ट बचा ले जाएगा अपना किला?

Daily news network Posted: 2018-02-14 12:49:27 IST Updated: 2018-02-14 12:49:27 IST
त्रिपुराः क्या भाजपा फहराएगी विजय पताका या लेफ्ट बचा ले जाएगा अपना किला?
  • सुर्खियों से काेसों दूर उत्तर पूर्वी भारत का छोटा सा राज्य त्रिपुरा, इन दिनों बात कुछ अलग है और सभी की निगाहें वहां होने वाले विधानसभा चुनाव पर टिकी हैं।

अगरतला।

सुर्खियों से काेसों दूर उत्तर पूर्वी भारत का छोटा सा राज्य त्रिपुरा, इन दिनों बात कुछ अलग है और सभी की निगाहें वहां होने वाले विधानसभा चुनाव पर टिकी हैं। वाममोर्चा के गढ़ के रूप में बचे आखिरी किलों में एक इस राज्य में पहली बार वाम और दक्षिण की लड़ाई देखी जा रही है। राज्य में भाजपा आैर माकपा की लड़ार्इ महज वोटों की नहीं बल्कि दो पूरी तरह उल्टी विचारधाराओं की है। इस बीच पीएम मोदी भी इस राज्य में विजय पताका फहराने को जी-जान से जुटे हैं। ऐसे में त्रिपुरा चुनाव को लेकर ये कुछ खास बातें...



त्रिपुरा में पिछले 20 (1998) सालों से माणिक सरकार के नेतृत्व लेफ्ट फ्रंट की सरकार चल रही है। बीजेपी यहां दो दशक पुरानी माणिक सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए एड़ी चोटी का बल लगा रही है। चुनाव में माकपा को शिकस्त देने के लिए भाजपा ने यहां की स्थानीय जनजातीय पार्टी पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (IPFT) से गठजोड़ भी किया है। पिछले पांच वर्षों के दौरान राज्य में मुख्य विपक्षी दल का दर्जा पहले कांग्रेस, फिर तृणमूल से होता हुआ अब बीजेपी के पास है।


किंगमेकर पार्टी

त्रिपुरा के आदिवासी बहुल पहाड़ी इलाकों में नेशनलिस्ट पार्टी ऑफ ट्वि्प्रा, नेशनल कॉउंसिल ऑफ त्रिपुरा और इंडिजेनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा की अच्छी पकड़ है। राज्य में खंडित जनादेश आने की स्थिति में ये पार्टियां किगमेकर की भूमिका निभा सकती है।


अब तक की राजनीति का सबसे संवेदनशील चुनाव

एेसा माना जा रहा है कि इस बार का त्रिपुरा विधानसभा चुनाव माणिक सरकार के राजनीतिक करियर का सबसे कठिन चुनाव होने वाला हैं। राज्य के मुख्यमंत्री माणिक सरकार अपनी सादगी से वहां के लोगों के बीच खासे लोकप्रिय हैं। हालांकि बीजेपी ने उनके खिलाफ यहां पुरजोर अभियान छेड़ रखा है और उन पर एक के बाद एक आरोप लगा रही है। राज्य में इस बार भी बंगालियों और आदिवासियों के बीच भेदभाव अब भी राज्य में एक अहम मुद्दा है।

1941 से लेकर 1951 के बीच राज्य में आदिवासियों की आबादी 53 फीसदी से घटकर 37 फिसदी तक पहुंच गई। वहीं 2011 की जनगणना में पता चलता है कि यहां की आदिवासी आबादी 30 फीसदी से थोड़ी ही ऊपर बची है। भारत के बंटवारे के बाद से यहां पूर्व पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से भारी संख्या में बंगाली हिन्दू त्रिपुरा में आकर बस गए हैं। इस कारण यहां बड़ा जनसांख्यिकीय (डेमोग्राफिक) बदलाव देखने को मिला।  त्रिपुरा के पहाड़ी इलाके जहां आज भी आदिवासी बहुल बने हुए हैं, वहीं राज्य के मैदानी हिस्सों में बंगाली आबादी भरी है।

आपको बता दें कि 1949 में त्रिपुरा भारत से जुड़ा था आैर उसके बाद से यहां की राजनीति में यह विभाजन अहम मुद्दा बना रहता है। वहीं 1971 की बांग्लादेश युद्ध के बाद राज्य में बांग्लाभाषियों का आगमन भी खूब बढ़ा।यही वजह रही है कि यहां कई बड़ी जातीय हिंसा भी देखने को मिली।  इस तरह की हिंसा की वारदातें 90 के दशक तक चलती रहीं, लेकिन तब ये मसला शांत ही है। राज्य में स्वायत्त आदिवासी प्रशासनिक एजेंसी और विवादित आफस्पा कानून हटाए जाने से राज्य में काफी हद शांति स्थापित है।