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चुनाव नतीजों ने माया के अस्तित्व पर लगाया प्रश्न चिह्न, बनी तीसरे नंबर की पार्टी!

Patrika news network Posted: 2017-03-11 11:02:31 IST Updated: 2017-03-11 11:02:31 IST
चुनाव नतीजों ने माया के अस्तित्व पर लगाया प्रश्न चिह्न, बनी तीसरे नंबर की पार्टी!
  • उत्तर प्रदेश की सत्ता में चार बार काबिज रह चुकी बीएसपी के लिए यह चुनाव अनुमानो से काफी हटके साबित हुआ है। चुनाव नतीजों के बाद मायावती की पार्टी तीसरे नंबर की पार्टी बन गई है।

लखनऊ।

उत्तर प्रदेश की सत्ता में चार बार काबिज रह चुकी मायावती के लिए यह चुनाव अनुमानो से काफी हटके साबित हुआ है। चुनाव नतीजों के बाद मायावती की पार्टी तीसरे नंबर की पार्टी बन गई है।



बता दें कि मायावती खुद को उत्तर प्रदेश की सत्ता का प्रमुख दावेदार मानती थी लेकिन नतीजे इससे उलट आए हैं। इस चुनाव में बसपा ने किसी भी राजनीतिक पार्टी से गठबंधन नहीं किया था, जबकि चुनाव की अहमियत को समझते हुए सपा ने कांग्रेस के साथ हाथ मिला लिया था। वहीं बीजेपी ने भी इस चुनाव में गठबंधन का सहारा लिया था। 



बता दें कि अगर मायावती यह चुनाव जीततीं तो वह पांचवीं बार मुख्यमंत्री बनती हैं और उनका कद और बड़ा हो जाता। लेकिन नतीजे इसके उलट आए हैं। इससे साफ नजर आ रहा  है कि यह चुनाव बीएसपी के लिए टर्निंग प्वाइंट साबित हुई है। इस नतीजे के बाद बीएसपी बिखर भी सकती है।



गौरतलब है कि बीएसपी 1984 में बनी लेकिन सत्ता का स्वाद उसने स्थापना के 11 साल बाद चखा था। संस्थापक कांशीराम का मानना था कि किसी भी तरह सत्ता की चाबी हाथ में लेना जरूरी है। दलितों के हाथ में सत्ता आएगी तभी कुछ किया जा सकता है। यही वजह है कि वह सत्ता पाने के लिए हर तरीके को जायज मानते थे। पहली बार उन्होंने मुलायम सिंह के साथ मिलकर सरकार बनाई।



उसके बाद 1995 में मुलायम सिंह की सरकार गिरा दी और मायावती पहली बार मुख्यमंत्री बनीं। उसके बाद से बीएसपी की राजनीति लगातार मायावती के इर्द-गिर्द ही घूमती रही। किसी भी नेता ने उनका विरोध किया तो उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। इस विधान सभा चुनाव से पहले भी मायावती ने आरके चौधरी, स्वामी प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक समेत कई नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाया।



पांच साल सत्ता से बाहर रहने के बावजूद मायावती ने किसी से गठबंधन नहीं किया। हालांकि उनके सामने कई विकल्प थे लेकिन अकेले ही चुनाव लड़ने का निश्चय किया। इसे उनका आत्मविश्वास कहा जाए या अति-आत्म विश्वास, यह तो नतीजे बता रहे हैं। चुनाव के नतीजे ने मायावती के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिह्न लगा दिया है। 



अगर जीत मिलती है तो देश में बड़ी नेता के तौर पर उभरतीं। सबसे ज्यादा बार मुख्यमंत्री रहने के अपने ही रेकॉर्ड बना पाती और उनका कद और भी बड़ा हो जाता। खासतौर से केंद्र की सत्ता और नरेंद्र मोदी से अकेले ही मुकाबला लेने के बाद यह जीत मायावती के लिए बहुत बड़ी होती। इस चुनाव में मिली हार के बाद उनके लिए उबरना बहुत मुश्किल होगा।



जीतने के मायने

देश की सबसे बड़ी दलित नेता के तौर पर मायावती की छवि पर मुहर लग जाती।देश की सबसे बड़ी नेता के तौर पर उनको जाना जाता। देश की राजनीति में दखल रखने की ताकत मिल जाती। बीएसपी की सोशल इंजीनयिरिंग एक बार फिर कारगर मानी जाती। सत्ता में आने के बाद पंजाब, उत्तराखंड सहित दूसरे राज्यों में भी पार्टी की गतिविधियां बढ़ाने में मदद मिलती।



हारने के मायने

पार्टी में भारी टूट-फूट के बाद किसी तरह उबरने के हार से पार्टी के बिखरने का खतरा बढ़ गया है। विरोधियों से अकेले मुकाबला करके चुनाव में लड़ी बीएसपी सभी दलों के निशाने पर होगी और बिना सत्ता के मुकाबला करना मुश्किल हो गया है। चुनाव से पहले बड़े नेता पार्टी छोड़ चुके हैं। हार के बाद अपनी ही पार्टी के नेताओं को सहेजना मुश्किल हो गया है। पहले से ही सभी दलों के निशाने पर मायावती पर दूसरे दलों के हमले और बढ़ जाएंगे। अपना अस्तित्व को बचाए रखने के लिए कई समझौते करने पड़ सकते हैं।