अरुणाचल के इस गांव में टॉयलेट जाना हर किसी के बस में नहीं, जानिए क्यों

Daily news network Posted: 2018-02-12 17:45:09 IST Updated: 2018-02-12 17:45:09 IST
अरुणाचल के इस गांव में टॉयलेट जाना हर किसी के बस में नहीं, जानिए क्यों
  • स्वच्छ भारत के तहत हर घर में शौचालय बनाने को बढ़ावा दे रही है लेकिन देश में एक जगह ऐसी भी है जहां शौचालय बनाने के लिए सीमेंट की एक बोरी 8 हजार रुपए में पड़ रही है।

ईटानगर

एक तरफ जहां केंद्र सरकार स्वच्छ भारत के तहत हर घर में शौचालय बनाने को बढ़ावा दे रही है लेकिन देश में एक जगह ऐसी भी है जहां शौचालय बनाने के लिए सीमेंट की एक बोरी 8 हजार रुपए में पड़ रही है। अरुणाचल प्रदेश में बना यह गांव मुख्य सड़क से कटा हुआ है। यहां लोगों को शौचालय निर्माण के लिए जरूरी सामान लाने के लिए 156 किमी तक चलना पड़ रहा है लेकिन जज्बा बना हुआ है।



जी हां, अरुणाचल प्रदेश के विजोयनगर में सीमेंट की एक बोरी 8 हजार रुपए में मिल रही है वो भी तब जब यह गांव में उपलब्ध हो। विजोयनगर, चांगलांग जिले का एक सब-डिविजनल कस्बा है जिसकी आबादी महज 1500 है।

गांव में संचार व्यवस्था के भी हाल बेहाल हैं। लोगों को गांव में पहुंचने के लिए सबसे करीब मियाओ से निकलने के बाद 5 दिन लगातार चलना पड़ता है। हालांकि, यहां एक साप्ताहिक हेलीकॉप्टर सेवा है जो चीजें यहां पहुंचाती है लेकिन वो भी मौसम के हालात पर निर्भर है।

गांव में स्वच्छ भारत के तहत हर घर में शौचालय निर्माण करवाया जा रहा है ताकि गांव खुले में शौच मुक्त हो सके।लेकिन इसके लिए लोगों को तगड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है।

गांव के हालात को लेकर बात करते हुए पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग विभाग के जूनीयर इंजीनियर जुमली एदो बताते हैं कि गांव में ज्यादातर लोग चकमा और हजोंग हैं। उन्हों यहां सीमेंट की एक बोरी के लिए 8 हजार रुपए देने पड़ते हैं वहीं टॉयलेट सीट के लिए कम से कम 2 हजार रुपए चुकाने होते हैं।

खबरों के अनुसार गांव में पीएचई विभाग हर घर में शौचालय का निर्माण कर रहा है। इसके लिए केंद्र से 10,800 रुपए और राज्य सरकार की तरफ से 9200 रुपए की सहायता मिल रही है।

एडो के अनुसार गांव में सारी सामग्री भारत-चीन-म्यांमार जंक्शन पर बने नम्दफा नेशनल पार्क से आती है। वो लोग सीमेंट की 150 किलो की एक बोरी के लिए 8000 रुपए लेते हैं।

वो लोग अपनी पीठ पर इस बोरी को रखकर पांच दिनों तक लगातार 156 किमी चलने के बाद गांव पहुंचते हैं ताकि गांव दिसंबर तक खुले में शौच मुक्त हो सके। एडो के अनुसार इन चुनौतियों के बाद भी स्वच्छ भारत का यह प्रोजेक्ट तेजी से आगे बढ़ रहा है।