असम: इस जाति में लड़कियां नहीं लड़के जाते हैं ससुराल

Daily news network Posted: 2017-05-17 17:19:16 IST Updated: 2017-05-17 17:19:16 IST
असम: इस जाति में लड़कियां नहीं लड़के जाते हैं ससुराल
  • इस जनजाति में लड़के के पैदा होना बुरा माना जाता है, ठीक वैसे ही जैसे भारत में पुरानी मानसिकता में लड़की पैदा होना माना जाता था

नई दिल्ली।

देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहां बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का नारा देते हैं, वहीं इस देश एक जनजाति ऐसी भी है, जो सदियों से बेटियों को घर में ऊंचा दर्जा देती है। जी हां, हम बात कर रहे हं खासी जनजाती की। इस जनजाति के लोग भारत के मेघालय, असम तथा बांग्लादेश के कुछ क्षेत्रों में निवास करते हैं। यह जनजाति पूरी तरह से लड़कियों के लिए समर्पित है



इस जनजाति में लड़के के पैदा होना बुरा माना जाता है, ठीक वैसे ही जैसे भारत में पुरानी मानसिकता में लड़की पैदा होना माना जाता था। लड़की के जन्म पर यहां जश्न होता है। लड़कियों पर यहां कोई रोक टोक नहीं है जैसे पुरुषप्रधान मानसिकता में लड़कियों पर होती है। यहां लड़कियां धन और दौलत की वारिस होती है न की लड़के। यहां लड़की को जब पहला पीरियड आता है तो इस मौके पर भी जश्न मनाया जाता है।



इस जनजाति में महिलाओं का वर्चस्व है। वह कई पुरुषों से शादी कर सकती हैं। इतना ही नहीं, पुरुषों को अपने ससुराल में ही रहना पड़ता है। हालांकि, हाल के सालों में यहां कई पुरुषों ने इस प्रथा में बदलाव लाने की मांग की है। उनका कहना है कि वे महिलाओं को नीचा नहीं करना चाहते, बल्कि बराबरी का हक मांग रहे हैं। इस जनजाति में परिवार के तमाम फैसले लेने में भी महिलाओं को वर्चस्व हासिल है। 



इसके अलावा, यहां के बाजार और दुकानों पर भी महिलाएं ही काम करती हैं। बच्चों का सरनेम भी मां के नाम पर होता है खासी समुदाय में सबसे छोटी बेटी को विरासत का सबसे ज्यादा हिस्सा मिलता है। इस कारण से उसी को माता-पिता, अविवाहित भाई-बहनों और संपत्ति की देखभाल भी करनी पड़ती है। छोटी बेटी को खातडुह कहा जाता है। उसका घर हर रिश्तेदार के लिए खुला रहता है। इस समुदाय में लड़कियां बचपन में जानवरों के अंगों से खेलती हैं और उनका इस्तेमाल आभूषण के रूप में भी करती हैं।