डेढ़ साल में खत्म कर देंगे तीन तलाक का ट्रेडिशन: पर्सनल लॉ बोर्ड

Daily news network Posted: 2017-04-12 11:39:35 IST Updated: 2017-04-12 11:39:35 IST
डेढ़ साल में खत्म कर देंगे तीन तलाक का ट्रेडिशन: पर्सनल लॉ बोर्ड
  • ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा है कि बोर्ड अगले डेढ़ साल में तीन तलाक की ट्रेडिशन खुद ही खत्म कर देगा। सरकार को इस मामले में दखल देने की जरूरत नहीं है। ये बातें ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वाइस प्रेसिडेंट डॉ. सईद सादिक ने कहीं।

नई दिल्ली।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा है कि बोर्ड अगले डेढ़ साल में तीन तलाक की ट्रेडिशन खुद ही खत्म कर देगा। सरकार को इस मामले में दखल देने की जरूरत नहीं है। ये बातें ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वाइस प्रेसिडेंट डॉ. सईद सादिक ने कहीं।



सोमवार रात यूपी के बिजनौर में हुए एक प्रोग्राम में डॉ. सादिक ने कहा कि तीन तलाक महिलाओं के साथ नाइंसाफी है। लेकिन यह मसला मुस्लिम कम्युनिटी का है। इसके साथ ही सादिक ने मुस्लिमों को बीफ न खाने की भी सलाह दी। उन्होंने कहा कि अगर सरकार देशभर में गोहत्या पर रोक लगाने का कानून लाती है तो मुस्लिम उसका स्वागत करेंगे। 

बाता दें कि इस बयान से दो दिन पहले ही बोर्ड ने दावा किया था कि साढ़े तीन करोड़ मुस्लिम महिलाएं शरीयत और तीन तलाक के सपोर्ट में हैं। इसी बीच, तीन तलाक और अयोध्या जैसे मुद्दों पर चर्चा के लिए बोर्ड ने 15-16 अप्रैल को बैठक बुलाई है। तीन तलाक मुस्लिम महिलाओं की डिग्निटी पर असर डालता है। केंद्र ने SC से कहा सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में दी गई लिखित दलील में केंद्र सरकार ने कहा कि तीन तलाक मुस्लिम महिलाओं की डिग्निटी (गरिमा) और सोशल स्टेटस (सामाजिक स्तर) पर असर डालता है। केंद्र ने यह भी कहा कि तीन तलाक से मुस्लिम महिलाओं के कॉन्स्टीट्यूशन में मिले उनके फंडामेंटल राइट्स की अनदेखी होती है। ये रस्में मुस्लिम महिलाओं को उनकी कम्युनिटी के पुरुषों और दूसरी कम्युनिटी की महिलाओं के मुकाबले कमजोर बना देती हैं।



बता दें कि सुप्रीम कोर्ट तीन तलाक खत्म हो या नहीं इस मुद्दे पर 11 मई से सुनवाई करेगा। सरकार ने कोर्ट में कहा कि भारत की आबादी में मुस्लिम महिलाओं की हिस्सेदारी 8% है। देश की ये आबादी सोशली और इकोनॉमिकली बेहद अनसेफ है। सरकार ने साफ किया कि महिलाओं की डिग्निटी से कोई कम्प्रोमाइज नहीं हो सकती।

केंद्र ने अपनी दलीलों में आगे कहा, 'लैंगिक असमानता का बाकी समुदाय पर दूरगामी असर होता है। यह बराबर की साझेदारी को रोकती है और आधुनिक संविधान में दिए गए हक से भी रोकती है।'



सरकार ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में 60 साल से ज्यादा वक्त से सुधार नहीं हुए हैं और मुस्लिम महिलाएं फौरन तलाक के डर से बेहद कमजोर बनी रहीं। केंद्र ने कहा, 'यह कहना सच हो सकता है कि तीन तलाक और एक से ज्यादा शादियों का असर कुछ ही महिलाओं पर होता है, लेकिन एक हकीकत यह भी है कि इसके दायरे में आने वाली हर महिला उसके खिलाफ इसके इस्तेमाल के डर और खतरे में जीती है। इसका असर उनके हालात, उसकी पसंद, उनके आचरण और उनके सम्मान के साथ जीने के उनके हकों पर पड़ता है।'

बता दें कि केंद्र सरकार ने ट्रिपल तलाक, निकाह हलाला और कई शादियों जैसी प्रथाओं का विरोध किया था। केंद्र ने कोर्ट से अपील की थी कि उसे जेंडर इक्विलिटी और सेक्युलिरिज्म के तौर पर इन मामलों को देखना चाहिए। लॉ और जस्टिस मिनिस्ट्री ने संविधान के आधार पर जेंडर इक्विलिटी, सेक्युलरिज्म, निकाह कानून और दूसरे इस्लामिक देशों में इस मामले पर अपनाए जा रहे तरीकों की दलीलें कोर्ट में पेश की थीं।

ट्रिपल तलाक का लेकर कोर्ट में कई पिटीशंस फाइल की गईं थीं। इनमें से एक सायरा बानो नाम की महिला ने दायर की थी। इसमें उन्होंने ट्रिपल तलाक और ऐसे ही मुद्दों पर कोर्ट से दखल की मांग की थी। उनकी पिटीशन में कहा गया था कि संविधान ने जेंडर इक्विलिटी की इजाजत दी है।