विश्व स्तर पर असम की लघु फिल्म 'लेटर्स फ्राम देउता' की जमकर हो रही है सरहना

Daily news network Posted: 2018-04-19 15:11:28 IST Updated: 2018-04-19 15:11:28 IST
विश्व स्तर पर असम की लघु फिल्म 'लेटर्स फ्राम देउता' की जमकर हो रही है सरहना
  • पिछले दिनों एडवांटेज असम के आयोजन के दौरान देश के जाने माने फिल्म निर्माता निर्देशक सुभाष घई ने फिल्मों पर बात करते हुए कहा कि

गुवाहाटी

पिछले दिनों एडवांटेज असम के आयोजन के दौरान देश के जाने माने फिल्म निर्माता निर्देशक सुभाष घई ने फिल्मों पर बात करते हुए कहा कि असमिया फिल्म उद्योग कठिनाइयों के दौर से गुजर रहा है।


इससे उबरने के उपायों के बारे में पूछने पर सरकारी नीतियों सहित अन्य कई पहलुओं के बारे में घाई ने कहा कि जो बात मेरे जेहन में घर कर गई थीं, वह अब सही साबित होती दिख रही है। उनका कहना था कि डिजीटल युग में भाषा कतई रोड़ा नहीं डाल सकती है।


अच्छीा पटकथा, अच्छी तकनीकी ज्ञान का प्रायोग एवं कहानी के साथ दर्शकों के सामने परोसा जाए तो किसी भी क्षेत्रीय भाषा में बनीं फिल्म, चाहे कम बजट में ही क्यों हो, वह अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपनी छाप छोड़ सकती है।


पिछले कुछ समय से असमिया फिल्मों का प्रदर्शन देशी- विदेश स्तर पर होने लगा है तथा इनकी सराहना भी हो रही है। इससे जुड़े नए पुराने कलाकरों के लिए यह बेहद सम्मान की बात है और इससे उनकी उम्मीदें फिर से जाग उठी हैं। सुभाष घई की कही बात का असमिया फिल्म उद्योग पर असर दिखने लगा है। अच्छे परिणाम भी सामने आ रहे हैं।


राज्य के जाने मानें सांस्कृतिक कर्मी, लेखक तथा असमिया फिल्म एवं मोबाइल थिएटर जगत से जुड़े गोपाल जालान भी कुछ ऐसा ही कर रहे हैं। इन दिनों वे एक 17 मिनट लंबी असमिया लघु फिल्म को लेकर चर्चा में हैं। जालान द्वारा प्रायोजित और अरूणजीत बरूवा के निर्देशन में बनी लघु फिल्म 'लेटर्स फ्राम देउता' देश विदेश में विभिन्न फिल्म महोत्सवों में दिखाए जाने के बाद काफी प्रशंसा बटोरने के अलावा कई पुरूस्कार जीतने में कामयाब हुई है।

लघु फिल्म'लेटर्स फ्राम देउता' कोे जूरी का विशेष पुरस्कार मिला था। इसके अलावा दरभंगा अंतर्राष्ट्रीय फिल्म उत्सव, लाॅस एंजेलेस सिने फेस्ट यूरेसिया इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल आदि में भी 'लेटर्स फ्राम देउता' को स्क्रीनिंग के लिए आमंत्रित किया गया है।


इस फिल्म की कहानी एक ल़ड़की की है जिसके कैंसर से पीड़ित पिता की मौत हो जाती है। दस साल की बच्ची के साथ उसकी बेवा मां के सामने एक लम्बी जिंदगी में क्या क्या परेशानी आती हैं और कैसे वह अपने पिता के दिए कुछ पत्रों में लिखी बातों को मानकर अपनी जिंदगी आसान बनाती हैं,यह दिखाया गया। इस फिल्म के माध्यम से लोगों को यह सिख दी गई है कि रास्ता कितना ही मुश्किलों से भरा क्यों ना हों लेकिन अगर आपकी राह सही हैं तो मुश्किल असान हो ही जाती है ।