असम में लादेन का कहर, दहशत में लोग, अब तक ले चुका है कईयों की जान

Daily news network Posted: 2018-04-19 12:07:08 IST Updated: 2018-04-19 13:59:11 IST
असम में लादेन का कहर, दहशत में लोग, अब तक ले चुका है कईयों की जान
  • लादेन का नाम आते ही आपके जेहन में खुद से अल-कायदा आतंकी संगठन के मुखिया की तस्वीर सामने आ जाती है।

गोलपारा।

लादेन का नाम आते ही आपके जेहन में खुद से अल-कायदा आतंकी संगठन के मुखिया की तस्वीर सामने आ जाती है, जिसने 11 सितंबर 2001 को अमरीका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला करवाकर पूरी दुनिया में दहशत फैला दी थी, लेकिन आज हम जिस लादेन की बात कर रहे हैं। उसने असम के गोलपारा में आतंक फैला रखा है। ये न तो काेर्इ अांतकवादी है आैर न ही काेर्इ इंसान, बल्कि ये एक पागल हाथी है।

 

अब तक इसने इलाके में 30 लोगों की जान ली है। इसलिए इस पागल हाथी को इलाके के लोग 'लादेन' के नाम से बुलाते हैं। असम के गोलापारा जिले के दुधनोई इलाके में ‘लादेन’ ने पिछले कुछ महीनों में कई लोगों की जान ली है, कई लोगों के घरों को तोड़े हैं ,साथ ही फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया है। लादेन को पटाखों आैर आग से भी खौफ नहीं है।


 

वन विभाग भी डरता है

इलाके के लोगों का कहना है कि इस पागल हाथी का इतना आतंक है कि वन विभाग के लोग भी इससे डरते हैं। लोगों का आरोप है कि वन विभाग के लोग उनकी मदद नहीं करते। हर बार जब किसी व्यक्ति की जान जाती है तो वन विभाग के लोग झूठा आश्वासन देते हैं कि जल्द ही ‘लादेन’ पर शिकंजा कस लिया जाएगा।


काबू करने की कोशिश में गर्इ कर्इयों की जान

वन विभाग के एक कर्मचारी कहते हैं, “लादेन ने गांव में बहुत तबाही मचाई है। इंसानों पर हमला करने के साथ वो फसल को भी काफी नुकसान पहुंचाता है। ‘लादेन’ को काबू करना वाकई बहुत मुश्किल है, इस कोशिश में कई लोगों ने अपनी जान गवां दी है। 


स्थिति अब आैर भी डरावनी

इलाके में रहने वाले अरुण रॉय ने बताया कि लादेन ने उनके पिता को कुचलकर मार डाला। वो कहते हैं, “मेरे पिता घर पर ही थे कि तभी ‘लादेन’ हमारे इलाके में आया और सबकुछ तबाह कर दिया। उसने पिताजी को घर के बाहर खींचा और उन्हें कुचल दिया। वह आता है तबाही मचाता है आैर चला जाता है। अब स्थिति बहुत डरावनी है। ”

 


सदियों से चलता आ रहा है इंसानों और जानवरों के बीच संघर्ष

इंसानों और जानवरों के बीच संघर्ष सदियों से चला आ रहा है, लेकिन हाल के दिनों में ये संघर्ष खूनी हो गया है। बढ़ती जनसंख्या और शहरीकरण ने जानवरों से उनका प्राकृतिक आवास छीना है। असम में साल 2006 से 2016 के बीच हाथियों ने 785 लोगों की जान ली। दूसरी तरफ 2001 से 2014 के बीच ट्रेन हादसे, शिकार और करंट लगने से 225 जानवरों की जान गई। वजह चाहे जो भी हो इस संघर्ष में हार दोनों की ही हो रही है।