Mother's Day: इस सुपर मॉम के आगे झुक गया माउंट एवरेस्ट

Daily news network Posted: 2018-05-13 15:15:32 IST Updated: 2018-05-13 15:32:09 IST
Mother's Day: इस सुपर मॉम के आगे झुक गया माउंट एवरेस्ट
  • कहते हैं भगवान हर जगह नहीं रह सकते इसलिए उन्होंने मां को बनाया ...मां शब्द में ही जीवन का सार छुपा होता है। तो चलिए आज मदर्स डे

कहते हैं भगवान हर जगह नहीं रह सकते इसलिए उन्होंने मां को बनाया ...मां शब्द में ही जीवन का सार छुपा होता है। तो चलिए आज मदर्स डे पर हम आपकों ऐसी सुपर-मॉम से से मिलवातें हैं जिन्होंने समाज के सामने एक मिसाल पैदा की है।



अरुणाचल प्रदेश के बोमडिला की अंशु जैमसेनपा ने पिछले साल पांच दिन के भीतर दो बार माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई कर नया इतिहास रच दिया था। इससे पहले भी वह दो बार दुनिया की सबसे ऊंची चोटी फतह कर चुकी हैं। पर्वतारोही होने के साथ-साथ अंशु दो बेटियों की मां भी हैं।



वह कहती हैं, ‘लोग आलोचना कर रहे थे कि अपने शौक के लिए बच्चों का भविष्य खतरे में डाल रही हो। मगर मैं चाहती थी कि मेरे बच्चे अपनी मां से प्रेरणा लें। मैं जानती थी कि एवरेस्ट पर जान भी जा सकती थी। ऐसे में अपने बच्चों के लिए मैंने डायरी लिखना शुरू किया ताकि अगर कुछ हो जाए तो मैं उन्हें बता सकूं कि उनकी मां स्वार्थी नहीं थी।' वह आगे बताती हैं, ‘छोटी बेटी को लगता था कि पर्वतारोहण भी एक प्रकार का खेल है। इसलिए जाने से पहले उसने मुझसे बोला, ‘मम्मी बेस्ट होकर आना। बस यही एक शब्द मुझे हौसला देता रहा।'



पंजाब की शान

रजनी बाला : सपनों को पूरा करने के लिए कोई समयसीमा नहीं होती। पंजाब के लुधियाना की रजनी बाला ने 44 साल की उम्र में अपने बेटे के साथ दसवीं की परीक्षा पास कर इस बात को साबित कर दिया है। रजनी ने 1989 में नौंवी पास की थी, लेकिन परिवार की मजबूरियों के चलते सिर्फ दो दिन पहले 10वीं की परीक्षा में नहीं बैठ पाई। चुनौतियां बहुत सी थीं, लेकिन हार नहीं मानीं। बेटे के साथ परीक्षा पास करने के लिए उन्होंने खुद को मशीन बना लिया। सुबह चार बजे उठकर पढ़ना, फिर परिवार के लिए खाना बनाना, नौकरी पर जाना और फिर अपने बेटे के स्कूल में जाकर ही पढ़ाई करना। अब उनकी ख्वाहिश अपने बेटे के साथ ही पढ़ाई को जारी रखना चाहती हैं।


तीन बच्चों की मां घरोब सीरिया के होम्स शहर के एक अनुसंधान केंद्र में मैनेजर थीं। हालात खराब हुए तो उन्हें परिवार समेत देश छोड़कर शरणार्थी कैंप में आकर बसना पड़ा। उन्होंने ट्रैक्टर चलाना सीखा और अब वह लोगों को पानी सप्लाई करती हैं। वह कहती हैं,‘मेरे पति कुछ समय के लिए बाहर थे। शरणार्थी कैंप में आने के बाद मैं और मेरे बच्चे अकेले पड़ गए थे। मुझे ट्रैक्टर चलाते देखकर कई पुरुष हैरान भी होते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि सब बराबर हैं।'