अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) के लिए प्रस्तावित एक्सिओम-4 मिशन को एक बार फिर स्थगित कर दिया गया है, जिससे भारत के गगनयात्री शुभांशु शुक्ला की अंतरिक्ष यात्रा का इंतजार और लंबा हो गया है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और स्पेसएक्स ने पुष्टि की है कि 11 जून, 2025 को निर्धारित लॉन्च अब तकनीकी कारणों से नहीं हो पाएगा। एक तरफ जहां एलन मस्क की कंपनी मौजूदा लॉन्च मिशनों में तकनीकी अड़चनों का सामना कर रही है, वहीं दूसरी ओर कंपनी ने भविष्य की एक बेहद महत्वाकांक्षी योजना का खाका भी पेश किया है, जिसके तहत अंतरिक्ष में ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के डेटा सेंटर स्थापित करने की तैयारी है।
फाल्कन 9 रॉकेट में तकनीकी खामी
ताजा स्थगन का मुख्य कारण स्पेसएक्स के फाल्कन 9 रॉकेट में आई खराबी है। इसरो द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार, फ्लोरिडा स्थित लॉन्च पैड पर रॉकेट के बूस्टर चरण का प्रदर्शन जांचने के लिए सात सेकंड का ‘हॉट टेस्ट’ किया गया था। इसी परीक्षण के दौरान प्रोपल्शन बे में लिक्विड ऑक्सीजन (LOX) के रिसाव का पता चला। सुरक्षा मानकों को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए, इसरो और स्पेसएक्स के विशेषज्ञों ने आपसी चर्चा के बाद यह निर्णय लिया है कि जब तक इस रिसाव को पूरी तरह ठीक नहीं कर लिया जाता और सभी सत्यापन परीक्षण पूरे नहीं हो जाते, तब तक उड़ान को मंजूरी नहीं दी जाएगी। फिलहाल प्रक्षेपण की कोई नई तारीख घोषित नहीं की गई है।
बार-बार टल रही है लॉन्चिंग
यह मिशन पहले भी कई बार टाला जा चुका है। शुरुआत में इसे 29 मई के लिए शेड्यूल किया गया था, जिसे बाद में तकनीकी खामियों के चलते 10 जून और फिर 11 जून तक खिसकाया गया था। यह मिशन भारत के लिए ऐतिहासिक महत्व रखता है, क्योंकि इसके जरिए शुभांशु शुक्ला पिछले चार दशकों में अंतरिक्ष की यात्रा करने वाले पहले भारतीय बनने जा रहे हैं। उनसे पहले 1984 में विंग कमांडर राकेश शर्मा ने सोवियत मिशन के तहत यह उपलब्धि हासिल की थी। केंद्र सरकार ने इस महत्वपूर्ण मिशन में भारत की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए 550 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया है, जो देश की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाओं को दर्शाता है।
अंतरिक्ष में डेटा सेंटर: भविष्य की नई होड़
जहाँ एक तरफ स्पेसएक्स अपने वर्तमान रॉकेटों की तकनीकी त्रुटियों को सुधारने में जुटा है, वहीं कंपनी ने अमेरिकी नियामक संस्था ‘फेडरल कम्युनिकेशंस कमीशन’ (FCC) के सामने एक ऐसा प्रस्ताव रखा है जो सिलिकॉन वैली की सोच से भी कई कदम आगे है। स्पेसएक्स ने निचली पृथ्वी कक्षा (Low Earth Orbit) में दस लाख उपग्रहों का एक विशाल नेटवर्क बनाने का प्रस्ताव दिया है। पहली नजर में यह आंकड़ा अवास्तविक लग सकता है, लेकिन इसका उद्देश्य पृथ्वी पर बिजली और संसाधनों की कमी की समस्या को सुलझाना है। एआई इंडस्ट्री को चलाने के लिए जमीन, पानी और बिजली की जिस तरह भारी मांग बढ़ रही है, उसे देखते हुए यह योजना एक व्यावहारिक समाधान के रूप में पेश की गई है।
पृथ्वी पर ऊर्जा संकट और अंतरिक्ष के फायदे
वर्तमान में एआई का विस्तार केवल चिप्स की आपूर्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि बिजली ग्रिड की क्षमता इसके रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा बन गई है। वर्जीनिया से लेकर डबलिन तक, विशाल डेटा सेंटर स्थानीय बिजली आपूर्ति पर भारी दबाव डाल रहे हैं। जमीन पर परमाणु रिएक्टर या बैटरी प्लांट लगाने में सालों लग जाते हैं और अनुमति मिलने में देरी होती है। इसके विपरीत, अंतरिक्ष में डेटा सेंटर्स को चौबीसों घंटे बिना रुकावट सौर ऊर्जा मिल सकती है और वहां का ठंडा वातावरण सर्वरों को ठंडा रखने (कूलिंग) की लागत को लगभग शून्य कर देता है। स्पेसएक्स का तर्क है कि इससे संचालन और रखरखाव की लागत में भारी कमी आएगी और पृथ्वी के नाजुक पावर ग्रिड पर निर्भरता खत्म हो जाएगी।
स्टारशिप और केसलर सिंड्रोम का खतरा
इस महत्वकांक्षी परियोजना का गणित स्पेसएक्स के विशालकाय रॉकेट ‘स्टारशिप’ पर टिका है। यदि स्टारशिप लॉन्च की लागत को भारी मात्रा में कम करने में सफल होता है, तो कक्षा में सर्वर स्थापित करना आर्थिक रूप से व्यवहारिक हो जाएगा। हालांकि, इसके सामने चुनौतियां कम नहीं हैं। दस लाख उपग्रहों को कक्षा में स्थापित करने से अंतरिक्ष में भीड़भाड़ खतरनाक स्तर तक बढ़ जाएगी, जिससे ‘केसलर सिंड्रोम’ का जोखिम पैदा हो सकता है—ऐसी स्थिति जहां मलबे की टक्कर से एक श्रृंखला अभिक्रिया शुरू हो जाती है और कक्षा उपयोग के लायक नहीं रहती। इसके अलावा, अंतरिक्ष का रेडिएशन एआई के नाजुक जीपीयू (GPUs) को खराब कर सकता है और वहां खराब हुए हार्डवेयर की मरम्मत करना संभव नहीं होगा।
नियामकीय और प्रशासनिक सवाल भी अभी अनुत्तरित हैं। अंतरिक्ष में स्थित ये डेटा सेंटर किसी एक देश के कर और पर्यावरण कानूनों के दायरे से बाहर काम करेंगे, जिससे डेटा संप्रभुता और ‘ऑर्बिटल रीयल एस्टेट’ पर एकाधिकार को लेकर गंभीर बहस छिड़ सकती है। फिलहाल, इसे पृथ्वी के भौतिक संसाधनों की सीमा और तकनीक के भविष्य के बीच एक बड़े दांव के रूप में देखा जा रहा है।
स्पेसएक्स की दोहरी चुनौतियां: एक्सिओम-4 मिशन फिर टला, अब अंतरिक्ष में ‘AI डेटा सेंटर’ बनाने की तैयारी
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